नरेंद्र पांडेय ब्यूरो रिपोर्ट बगहा प. चंपारण बिहार…………………………………
**चंद्रमा की अमृतमयी किरणों से जुड़ी है परंपरा, पूजा-अर्चना के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण की जाती है खीर**
**बगहा।** सनातन धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। आश्विन मास की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले इस पर्व पर श्रद्धालु भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और चंद्रदेव की पूजा-अर्चना करते हैं। इस रात खीर बनाकर खुले आसमान के नीचे रखने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। धार्मिक मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और उसकी किरणों में विशेष अमृतमयी गुण होते हैं।
**चंद्रमा की किरणों से जुड़ी है मान्यता**
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की रोशनी को अमृत के समान कल्याणकारी माना जाता है। इसी विश्वास के आधार पर दूध, चावल और चीनी से बनी खीर को रात में खुले आसमान के नीचे रखा जाता है, ताकि उस पर चंद्रमा की किरणें पड़ सकें। श्रद्धालु मानते हैं कि इससे खीर में विशेष पवित्रता और सकारात्मकता आती है। इसके बाद सुबह या रात्रि में पूजा-अर्चना के उपरांत खीर को प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों और अन्य लोगों के बीच वितरित किया जाता है।

**माता लक्ष्मी की कृपा की कामना**
शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, इस रात माता लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं और जागकर उनकी आराधना करने वाले भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। इसी कारण कई स्थानों पर श्रद्धालु रात में जागरण करते हैं, दीप जलाते हैं और माता लक्ष्मी की पूजा कर सुख-समृद्धि तथा धन-धान्य की कामना करते हैं।
**आस्था और परंपरा का संगम**
शरद पूर्णिमा केवल पूजा-पाठ का पर्व नहीं, बल्कि परिवार और समाज के बीच धार्मिक परंपराओं को जीवित रखने का अवसर भी है। हालांकि, खीर पर चंद्रमा की किरणें पड़ने से उसमें औषधीय या विशेष स्वास्थ्य लाभ होने का दावा वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है। खुले में रखी खीर को धूल, कीड़ों और अन्य दूषित तत्वों से बचाना भी जरूरी है। इसलिए खीर को ढककर रखना उचित है।
इस प्रकार शरद पूर्णिमा की रात खीर रखने की परंपरा सनातन धर्म में चंद्र उपासना, माता लक्ष्मी की आराधना और प्रसाद ग्रहण करने की आस्था से जुड़ी हुई है।
