……नवरात्र में नौ दिनों तक होती है मां दुर्गा की आराधना, लेकिन महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा साल के 365 दिन जरूरी.
नरेंद्र पांडेय ब्यूरो रिपोर्ट बगहा प. चंपारण बिहार………………………………….
भारत में नवरात्र का पर्व मां दुर्गा की आराधना, शक्ति की उपासना और नारी सम्मान का संदेश देता है। इन नौ दिनों में मंदिरों में जयकारे गूंजते हैं, कन्या पूजन किया जाता है और महिलाओं को देवी स्वरूप मानकर सम्मान दिया जाता है। लेकिन इसी समाज में जब महिलाएं घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना, मानसिक शोषण और यौन हिंसा का सामना करती हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारी धार्मिक आस्था सामाजिक व्यवहार में भी दिखाई देती है?

…नारी को देवी मानने वाले समाज में उसकी सुरक्षा आज भी गंभीर सवाल.
विडंबना यह है कि एक ओर महिलाओं को शक्ति, लक्ष्मी और दुर्गा का स्वरूप बताया जाता है, वहीं दूसरी ओर अनेक महिलाओं को अपने ही घरों और समाज में भेदभाव तथा हिंसा का सामना करना पड़ता है। किसी महिला के साथ अपराध होने पर कई बार उसके चरित्र, पहनावे, समय और उसके बाहर निकलने पर सवाल उठाए जाते हैं। इसके विपरीत, अपराध करने वाले की जिम्मेदारी और उसके कृत्य पर सवाल उठाना अधिक जरूरी है।
किसी महिला के कपड़े, उसका अतीत या उसके कहीं आने-जाने का निर्णय किसी को भी उसके शरीर और जीवन पर अधिकार नहीं देता। उसकी सहमति और गरिमा का सम्मान करना प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है। किसी भी अपराध के लिए पीड़िता को दोषी ठहराना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि इससे पीड़ित व्यक्ति के लिए न्याय की राह भी कठिन हो सकती है।
…घर की इज्जत के नाम पर नहीं दबे महिलाओं की आवाज.
घरेलू हिंसा और दहेज प्रताड़ना के मामलों में कई महिलाएं परिवार की प्रतिष्ठा, सामाजिक बदनामी और भविष्य की चिंता के कारण अपनी पीड़ा खुलकर सामने नहीं रख पातीं। ऐसे में परिवार और समाज का दायित्व है कि वे पीड़ित महिला की बात सुनें, उसे सुरक्षा दें और जरूरत पड़ने पर कानूनी सहायता उपलब्ध कराने में सहयोग करें।
इसी तरह यौन हिंसा की पीड़िता को सहानुभूति के नाम पर दया नहीं, बल्कि सम्मान, निष्पक्ष जांच और न्याय की जरूरत होती है। उसकी पहचान और निजता की रक्षा करना भी समाज तथा संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी है।
….सच्ची भक्ति तभी, जब सुरक्षित हों बेटियां.

नवरात्र में मां दुर्गा के हाथों में अस्त्र-शस्त्र देखकर हम बुराई पर अच्छाई की जीत की कामना करते हैं। लेकिन जब किसी महिला के साथ अन्याय होता है, तब समाज की चुप्पी और उदासीनता कई सवाल खड़े करती है। धार्मिक आयोजनों के साथ-साथ परिवारों, विद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं में भी समानता, सहमति, सम्मान और जिम्मेदारी की शिक्षा को महत्व देना आवश्यक है।
महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानूनों का प्रभावी पालन, अपराधों की निष्पक्ष जांच, समय पर न्याय और पीड़ितों को सहायता मिलना जरूरी है। साथ ही, पुरुषों और महिलाओं दोनों को ऐसी सामाजिक सोच विकसित करनी होगी, जिसमें किसी भी तरह की हिंसा या उत्पीड़न को स्वीकार न किया जाए।
… 365 दिन महिला सम्मान का संकल्प जरूरी.
नारी सम्मान केवल नवरात्र के नौ दिनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसकी वास्तविक शुरुआत घर से होती है, जहां बेटियों और बेटों को समान अवसर दिए जाएं, महिलाओं की इच्छाओं और निर्णयों का सम्मान किया जाए तथा हिंसा के विरुद्ध आवाज उठाने वालों का साथ दिया जाए।
जिस समाज में देवी की पूजा होती है, वहां जीवित महिलाओं की गरिमा, स्वतंत्रता और सुरक्षा भी सर्वोच्च महत्व रखनी चाहिए। मंदिरों में आराधना के साथ व्यवहार में समानता और संवेदनशीलता अपनाना ही सच्ची श्रद्धा का परिचायक है।
बोलीं निधि राय….

रामनगर के समाजसेवी महिला निधि राय ने इस संदर्भ में कहा कि संदेश स्पष्ट है—नारी को देवी कहने से पहले उसे एक स्वतंत्र, सम्मानित और अधिकार-संपन्न इंसान के रूप में स्वीकार करना होगा। नवरात्र के नौ दिनों की पूजा तभी सार्थक होगी, जब वर्ष के सभी 365 दिन महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा के लिए समाज सजग रहेगा।
