नरेंद्र पांडेय ब्यूरो रिपोर्ट बगहा प. चंपारण बिहार…..
बगहा/चंपारण। सत्य, अहिंसा और राष्ट्रसेवा की जिस चेतना ने 1917 के चंपारण सत्याग्रह से देश को नई दिशा दी थी, उसका प्रभाव आज भी चंपारण की धरती पर महसूस किया जाता है। महात्मा गांधी द्वारा शुरू किया गया चंपारण सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण अध्याय बना, जिसने अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनजागरण की नई लहर पैदा की।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री की जयंती पर देशभर में उन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया गया।

बगहा के विभिन्न स्थानों पर उनके चित्रों पर पुष्पांजलि अर्पित कर उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया गया। लोगों ने कहा कि गांधी जी का सत्य और अहिंसा का संदेश तथा शास्त्री जी का “जय जवान, जय किसान” का मंत्र आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्र निर्माण के दौर में था।
चंपारण की ऐतिहासिक धरती ने देश को यह सिखाया कि अन्याय के विरुद्ध शांतिपूर्ण संघर्ष भी बड़े बदलाव ला सकता है। गांधी जी ने यहां किसानों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी, वहीं लाल बहादुर शास्त्री ने सादगी, ईमानदारी और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने का संदेश दिया।

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डॉक्टर अरविंद नाथ तिवारी ने कहा………………..
यदि आज की पीढ़ी इन महापुरुषों के आदर्शों को अपने जीवन में उतारे, तो समाज में भाईचारा, सद्भाव और नैतिक मूल्यों की मजबूती बढ़ेगी। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानियों—बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल और राम प्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों के योगदान को भी याद किया, जिन्होंने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा। साथ ही उन्होंने कहा कि
चंपारण की धरती आज भी सत्याग्रह, संघर्ष और सामाजिक जागरूकता की पहचान है।

महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को जीवन में अपनाने का संदेश भी देती है।
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काश आज भी भारत सोने की चिड़िया होती……….
लेखक पत्रकार डॉक्टर अरविंद नाथ तिवारी ने बड़ी विनम्रता और सहजता और गहनता के साथ सोने की चिड़िया और भारत पर विश्लेषण करते हुए कहा कि एक जमाना था जो देश में एक ही जाति समुदाय के लोग एकता अहिंसा सद्भाव शिष्टाचार वैमनस्व से दूर देश अपना घर अपनी पड़ोसी का दर्द मेरा दर्द था ।वह हिंदुस्तानी वाला देश जाति कहलाते थे।

यह बातें अक्सर अग्रेज अफसर कहते नजर आते थे ये हिंदुस्तानी है। आज की परिवेश में वहीं 1857, 1917, 1947 की यादों को ताजा किया जाय, उन विचारों धारणाओं सहित अन्य परंपराओं को सहेज कर चला जाय तो आज भी हिंदुस्तान सोने की चिड़िया है और रहेगा।
