ब्यूरो रिपोर्ट धर्मेंद्र सर्राफ बेतिया प. चंपारण बिहार…..………………
भारत की समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में हरतालिका तीज का विशेष महत्व है। आम लोगों की बोलचाल की भाषा में इसे सिर्फ ‘तीज’ कहा जाता है। मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में इसे श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

दक्षिण भारत में यही परंपरा ‘गौरी हब्बा’ के रूप में प्रचलित है।
बिहार-झारखंड में सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना करती हैं। वहीं कुंवारी युवतियां मनोवांछित और योग्य वर की प्राप्ति के लिए यह कठिन व्रत रखती हैं
*निर्जला व्रत है सबसे बड़ी विशेषता*
हरतालिका तीज की सबसे विशिष्ट बात इसका निर्जला स्वरूप है। इस दिन महिलाएं पूरे दिन बिना अन्न और जल ग्रहण किए भगवान शिव एवं माता पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं। कई क्षेत्रों में महिलाएं बालू अथवा मिट्टी से शिव-पार्वती की प्रतिमाएं बनाकर पूजा करती हैं और रात में जागरण करती हैं। यह परंपरा धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्रकृति से मनुष्य के गहरे संबंध को भी दर्शाती है
*शिव आराधना में छिपा है पर्यावरण संदेश*

यदि तीज पर्व को धार्मिक दृष्टिकोण से आगे बढ़कर पर्यावरणीय नजरिये से देखा जाए तो इसके भीतर प्रकृति संरक्षण का महत्वपूर्ण संदेश दिखाई देता है। भारतीय संस्कृति में भगवान शिव को प्रकृति और जीव-जगत का संरक्षक माना गया है। उनका पर्वतों पर निवास, गले में सर्प धारण करना, जटाओं में गंगा का वास और उनके साथ विभिन्न जीव-जंतुओं का जुड़ाव प्रकृति के प्रति सह-अस्तित्व और संरक्षण की भावना को प्रदर्शित करता है
