बगहा/विशेष संवाददाता नरेंद्र पांडेय….
सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में इन दिनों एक कथन तेजी से वायरल हो रहा है— “संत्री पढ़ा-लिखा, मंत्री अनपढ़”। इस कथन को लेकर लोगों के बीच बहस छिड़ गई है कि शासन और प्रशासन में शिक्षा का कितना महत्व है तथा जनप्रतिनिधियों की योग्यता का आकलन किस आधार पर किया जाना चाहिए।
जानकारों का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मंत्री बनने के लिए जनता का विश्वास और चुनाव जीतना प्रमुख आधार होता है। वहीं प्रशासनिक कार्यों के संचालन में अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। भारत के संविधान में सांसद, विधायक या मंत्री बनने के लिए किसी न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता को अनिवार्य नहीं बनाया गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, शिक्षा व्यक्ति की समझ और कार्यशैली को बेहतर बना सकती है, लेकिन जनप्रतिनिधि की सफलता केवल शैक्षणिक डिग्री से नहीं, बल्कि उसके नेतृत्व, जनसेवा, निर्णय क्षमता और जनता के प्रति जवाबदेही से भी आंकी जाती है।

सोशल मीडिया पर वायरल इस कथन को लेकर विभिन्न वर्गों की अलग-अलग राय सामने आ रही है। कुछ लोग शासन में उच्च शिक्षा को आवश्यक मानते हैं, जबकि अन्य का कहना है कि जनता की समस्याओं की समझ और समाधान की क्षमता अधिक महत्वपूर्ण है।
इस विषय पर बहस जारी है और लोग अपने-अपने दृष्टिकोण से इसे देख रहे हैं।
