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जंगली खूंखार जानवरों के साये में खेती करने चले किसान, वन विभाग की टीम के निगरानी में किसान पहुंच रहे खेत, खतरा नहीं टीम के साथ किसान जाएं खेत

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ड्रोन और ट्रैकिंग टीमों से निगरानी तेज

खतरा टलने तक समूह में खेतों पर जाने की सलाह

वाल्मीकिनगर से नरेंद्र पांडेय की रिपोर्ट…

वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के जंगलों से सटे भेड़ीहारी इलाकों में बाघ के हमले में किसान की मौत के बाद ग्रामीणों में दहशत का माहौल है। खेतों में काम करने वाले किसानों की सुरक्षा को लेकर वन विभाग ने निगरानी और गश्त बढ़ा दी है। अब किसान भी सामान्य दिनों की तरह अकेले खेतों की ओर जाने से बच रहे हैं। कई जगह वनकर्मियों और निगरानी टीमों की मौजूदगी में ही किसानों को खेतों तक जाने की अनुमति दी जा रही है, ताकि किसी अप्रिय घटना से बचा जा सके। प्रभावित इलाकों में वन विभाग की टीमें खेतों और सरेह के आसपास लगातार गश्त कर रही हैं। खेतों के आसपास वनकर्मियों को तैनात किया गया है। वन विभाग की टीमों का मुख्य उद्देश्य बाघ की गतिविधियों पर नजर रखना और उसकी मौजूदगी वाले क्षेत्रों को चिन्हित कर ग्रामीणों को समय रहते सतर्क करना है। वन विभाग की ओर से ग्रामीणों को स्पष्ट रूप से अकेले खेतों में नहीं जाने की सलाह दी गई है।

किसानों से कहा गया है कि वे संभव हो तो समूह में ही खेती-किसानी का काम करें और सुबह-शाम के संवेदनशील समय में खेतों में जाने से बचें। खेतों में जाने के दौरान आसपास की झाड़ियों और गन्ने अथवा ऊंची फसल वाले इलाकों में विशेष सावधानी बरतने की अपील की गई है। बाघ की तलाश और निगरानी के लिए ड्रोन कैमरों, गश्ती दलों और अन्य संसाधनों का सहारा लिया जा रहा है। संवेदनशील इलाकों में लाउडस्पीकर के माध्यम से भी ग्रामीणों को लगातार सावधान किया जा रहा है। वन विभाग की कोशिश है कि बाघ की लोकेशन का पता लगाकर उसे सुरक्षित तरीके से जंगल की ओर लौटाया जा सके। ग्रामीणों का कहना है कि खेती का मौसम होने के कारण खेतों को पूरी तरह छोड़ना संभव नहीं है। फसल की देखभाल और कृषि कार्य जरूरी हैं, लेकिन बाघ की मौजूदगी ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे में वन कर्मियों की निगरानी उनके लिए सुरक्षा का बड़ा सहारा बनी हुई है।

वन विभाग का मानना है कि जब तक बाघ की गतिविधियां पूरी तरह जंगल तक सीमित नहीं हो जातीं, तब तक ग्रामीणों को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होगी। खतरा टलने के बाद ही किसान सामान्य रूप से खेतों में काम कर सकेंगे। फिलहाल जंगल से सटे गांवों में ‘सतर्कता के साथ खेती’ ही किसानों की मजबूरी और सुरक्षा का सबसे बड़ा उपाय बनी हुई है।

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